تأرجح الروح – ماجدة زيتون

ماجدة زيتون

مأخوذةٌ.. بذاتِها..
تتأرجحُ.. تترنّحُ.. 
بين قمّةٍ.. وهاوية.. 
على شفير منحدرْ..

صراعٌ تخوضُه كلَّ ليلة… 
كمن يسير مستمتعاً.. 
على حد سكّينٍ.. 
كمن يخطو..
في درب شوكٍ وجمرٍ..
وحجرْ..

من أين تسرّب إليها؟.. 
وكيف؟
كلّ هذا الزخم من التناقض..
يلوحُ لظىً تتأجّجُ.. 
لا تعرف هوادة أو مستَقَرْ..

كيف.. يعنيها الجميع.. 
ولا يعنيها أحد؟… 
تتآلف مع الجميع.. 
لكن..
خارج قوانينِ البشرْ..

عواطفٌ تترصّدها.. 
تتلقّفها.. 
بين اضطرابٍ وصمتٍ.. 
كما بين مدٍّ وجزرٍ.. 
لحظةُ لا مبالاة… 
وساعات حذَرْ..

مرميّةً… منسيّة.. 
ما بين سكونٍ.. مجنون… 
ثوران محيط.. بلا شواطئ..
بركانٌ هامدٌ.. وفجأة انفجرْ..

كزاهدةٍ في الحياة.. 
تستهويها العزلة… 
يجذبها الهروب..
فتبدو متراميةً..
بعيدةً كما السّفرْ..

متردّدةً كسحابة.. 
متلعثمةً… كريح.. 
متهاويةً.. متداعية..
بلا ولادةٍ.. وبلا قدرْ..

متلاشية كدمعةٍ..
أضاعت هويّتها.. 
حينما انهمرت صدفةً..
مع مواسم مطرْ..

كنوتةٍ حائرة… هائمة.. 
على وجه الوجع..
بين موسيقا وسجع.. 
بين مسِّ الجاز..
و شجنِ الناي.. 
ورنّةِ الوترْ..

1 thought on “تأرجح الروح – ماجدة زيتون

اترك رد

%d مدونون معجبون بهذه: